राष्ट्राभिमान की प्रज्जवलित अग्निशिखा हैं ठाकरेजी

राष्ट्राभिमान की प्रज्जवलित अग्निशिखा हैं ठाकरेजी

ठाकरे जी से मेरा सम्पर्क काफी पुराना है। 1953-54 में जब मैं भारतीय जनसंघ का एक साामान्य कार्यकर्ता था, शायद तभी से उनसे मेरा सम्पर्क रहा। लेकिन परिचय 1958-59 से शुरू हुआ। जब भोपाल में रहकर मैं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहा था। लखेरापुरा के एक मकान के प्रथम तल के हॉल में तब कार्यालय था। जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक तथा जनसंघ के कार्यकर्ता के नाते मेरा आना जाना होता था। उनसे मेरा घनिष्ट परिचय था। इस नाते प्राय: ही मेरा कार्यालय आना होता था। जहां ठाकरे जी से नमस्कार होता था। छोटा कार्यकर्ता होने के नाते कुछ दूरी से ही उनसे बात करता था। पर मैंने अनुभव किया कि ठाकरेजी अत्यंत आत्मीयता से मुझसे बात करते थे। परिवार के हाल चाल पूछते थे। पढ़ाई-लिखाई के बारे में चर्चा करते थे। यदा-कदा छोटा-मोटा काम भी बता देते थे। ऐसे ही धीरे-धीरे परिचय आत्मीयता में परिवर्तित हो गया।
संघ के एक स्वयंसेवक के नाते मन में यह इच्छा सदैव बलवती रहती कि मैं भी पूर्ण समय देकर संगठन का कार्य करूं।
एक दिन अचानक ही ठाकरेजी ने बड़ी आत्मीयता से कहा कि वे मुझे संगठन मंत्री बनाना चाहते हैं। जब उन्होंने मेरी राय इस विषय में चाही तो मैंने उन्हें बताया कि मेरी भी इच्छा कार्य करने की है पर अभी मेरी उच्च शिक्षा चल रही है। राजनीति में पूरी तौर से आने से पूर्व मैं अपनी शिक्षा पूरी करना चाहता हूं। क्योंकि यह मेरी मान्यता है कि राजनीतिक कार्यकर्ता पूर्ण ज्ञानवान हो ताकि कोई यह न समझे कि पढ़े लिखे तो हैं नहीं, राजनीति में आ गये, जहां किसी प्रमाण पत्र की जरूरत ही नहीं। मैंने ठाकरे जी को बताया कि इन दिनों मैं एक समाचार पत्र में काम करते हुए अपनी शिक्षा पूरी कर रहा हूं। अत: वे भोपाल में ही मुझे कोई काम दे दें, लेकिन उन्हें तो मन्दसौर के लिए आवश्यकता थी, इसलिए बात आई, गई हो गई और उनसे मेरा सम्पर्क बना रहा। इसी बीच 1962 के आम चुनाव आ गए। ठाकरे जी की निगाह तो मेरे ऊपर थी ही। उन्होंने चुनाव का काम करने को कहा और मैंने 1962 के चुनाव में भारतीय जनसंघा के प्रदेश कार्यालय का काम संभालना शुरू किया और उसके बाद तो फिर इस काम से छुट्टी ही नहीं मिली। उन दिनों मैं बरखेड़ी में रहता था। पर कार्यालय का काम संभालने के बाद पीरगेट में भारतीय जनसंघ के कार्यालय के ही बगल वाले हिस्से में आ कर रहने लगा। ठाकरे जी के साथ प्रदेश भारतीय जनसंघ कार्यालय में काम करने लगा।
यह भी सही है कि संगठन में प्रेम, सौहार्द, भाईचारा, एकजुटता हेतु बड़े से बड़ा विषपान करके भी वे अमृत ही देते रहे हैं। मध्यप्रदेश में भारतीय जनसंघ के आरम्भ से उनकी राजनीतिक यात्रा में अनेक उतार-चढ़ाव कठिनाइयों, जय-पराजयों, आघातों-प्रतिघातों, शोक-संताप के अनेक अवसर आये। मगर वे टूटे नहीं, झुके नहीं, हारे नहीं और अपने परिश्रम और कौशल से जिन आकाशीय ऊँचाईयों तक पार्टी को पहुंचाया है, कभ नहीं कहा। इसमें हजारश: कार्यकर्ता के परिश्रम और उनका विशेष योगदान ही तो है।
इन्हीं सुविचारों, संस्कारों, सदगुणों ने ठाकरेजी को भारतीय राजनीति तथा राष्ट्रसेवा का अद्वितीय पुरुष बना दिया है। अन्यथा लगभग 5 दशकों तक सक्रिय राजनीति से जुड़े रहकर भी निष्कलंक रह पाना असम्भव है। ठाकरेजी ने इस असंभव को भी सम्भव कर दिखाया। वे राजनीति को जनसेवा का उपकरण मानते है। सत्ता भोग की सीढ़ी कदापि नहीं। सक्रिय राजनीति के मध्य भी वे कमलपत्रमिव कामम्सा की उक्ति को चरितार्थ करते हैं। पानी में रहकर भी गीला नहीं होते कमल के पत्ते की तरह। अत: जीवित जाग्रह समर्पण की प्रतिमा, सहृदयता का अनन्य भण्डार, राष्ट्रभिमान की प्रज्जवलित अग्निशिखा है श्री ठाकरे।
कैलाश सारंग

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