ठाकरेजी का रोम-रोम राष्ट्र के लिए समर्पित

ठाकरेजी का रोम-रोम राष्ट्र के लिए समर्पित

1957 की घटना है। मध्यप्रदेश के सुदूर अंचल खरसिया में कुशाभाऊ जी ठाकरे जनसंघ के प्रवास पर पहली बार आये। प्रत्यक्ष रूप से मेरी भेंट खरसिया में ही हुई। ठाकरेजी जनसंघ के प्रांतीय मंत्री के रूप में पहली बार हमारे यहां पहुंचे। मैं खरसिया मण्डल का अध्यक्ष था। इस बैठक में ठाकरेजी की पद्धति, कार्य करने की पद्धति, कार्यकतार्ओं से बात करने की पद्धति ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। स्वयंसेवक मैं भी था। जनसंघ में कुशाभाऊ जी ठाकरे से संगठनात्मक स्तर पर भेंट और चर्चा का क्रम निरन्तर बढ़ता गया।
1957 से आज तक चार दशकों में हजारो दिन का अनवरत संपर्क कार्य करते-करते आज उस स्थिति में ला खड़ा कर दिया कि सहज रूप से ऐसा लगने लगा कि ठाकरेजी पार्टी के नेता नहीं परिवार के बड़े भाई हैं। उनकी सादगी, सरलता, निष्पृहता भरे उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व ने हम सबको इतना बांध लिया कि वे हमारे कार्यक्षेत्र के मार्गदर्शक ही नहीं बल्कि प्रेरणा के स्त्रोत बनते गये। ठाकरेजी कोई बात यदि कहते थे तो हम उसे आदेश मानकर ही विरोधार्य करते हैं।
1990 में भाजपा की सरकार आयी, सुन्दर लाल पटवा प्रांतीय अध्यक्ष थे। सत्ता के इस नाजुक दौर में ठाकरेजी ने मुझे कार्यकारी अध्यक्ष का भार देकर असीम विश्वास दिलाया। छत्तीसगढ़ क्षेत्र को छोड़कर मैं भोपाल रहने लगा। भोपाल में 47 बंगला बी-31 और बी-32 दो बंगले थे। बी-32 श्री कैलाश सारंग जो उस समय राज्यसभा के सदस्य भी थे, उनका बंगला था और बी-31 मुझे दिया गया था। सारंग जी के बंगले में प्रांतीय कार्यालय था और मा. ठाकरेजी का एक छोटा सा कमरा बी-31 में था। ठाकरेजी की कार्यपद्धति को नित्य देखने का, ठाकरेजी का मार्गदर्शन, ठाकरेजी की जीवन शैली, ठाकरेजी के उदात्त विचार, ठाकरेजी की महानता, उनकी उदारता को निकटता से देखने का ऐसा अनुपम अवसर शायद मेरे जीवन में अब नहीं आयेगा। परिस्थिति विषम हो या सम, समस्या चाहे जितनी भी जटिल हो, ठाकरेजी सहज उस समस्या का समाधान निकाल लेते हैं।
कुशाभाऊ ठाकरे का रोम-रोम राष्ट्र के लिए समर्पित है। उनका समर्पण सृजन के रूप में प्रदेश ही नहीं, देश के अनेक राज्यों के संगठनों में देखा जा सकता है। कुशल संगठक, प्रखर राष्ट्रवादी, भारत मां के चरणों में स्वयं निमित्त मानकर अपने ध्येय के लिए अनवरत प्रयास करते-करते 50 वर्ष से अधिक बिना किसी आरोप-प्रत्यारोप के निकाल लेना आज की राजनीति में अनुपम और अनुकरणीय उदाहरण ही है। राजनीतिक क्षेत्र में अब विरले लोग ही बचे हैं, जिन पर आरोप की आंच न आयी हो।
राजनीतिक जीवन में आरोप-प्रत्यारोप से कोई संभवत: नहीं बच पाता है, ऐसे कुछ प्रसंग ठाकरेजी के जीवन में भी आये, लेकिन ठाकरेजी ने ऐसे अवसरों पर न तो धैर्य खोया और न विचलित हुए, न दबे। देखने में आया कि संगठन का अहित करने वालों के सामने वे सीना ठोंकरकर खड़े हुए और प्रयत्न किया कि समस्या का समाधान हो जाये। वे राजनीतिक जीवन में कटु निर्णय लेने वालों में प्रमुख स्तम्भ है। संगठन हित को देखते हुये निष्पक्ष भाव से सामूहिक रूप से जो निर्णय होते हैं, ठाकरेजी उसी को मान्य करते है। संगठन का निर्णय यानी आदेश निर्णय के पूर्व चाहे जितनी चर्चा परन्तु निर्णय के बाद सबको उस निर्णय पर एकजुट होकर जुटने का आह्वान, यही ठाकरेजी का संदेश रहता है।
कुशाभाऊ ठाकरेजी की पहचान पदों से नहीं है। उन्होंने अनवरत् प्रवास मध्य प्रदेश के सुदूर अंचल तक कार्यकतार्ओं की एक लम्बी श्रृंखला खड़ी कर प्रदेश में भाजपा को उस स्थिति में ला खड़ा कर दिया है। जहां से नित्य कांग्रेस को भाजपा से सशक्त चुनौती मिल रही है।

लखीराम अग्रवाल

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